क्या है पूरा मामला
इतिहास में शायद ये पहला मौका है जब एएसआई खजाने की खोज में खुदाई करा रहा है और ये भी पहला ही मौका है जब विभाग ने विज्ञान नहीं, एक साधु के सपने को आधार बनाया होगा.
दरअसल, कानपुर देहात में रहने वाले शोभन सरकार ने एक सपना देखा था. उन्नाव के डौंडिया खेड़ा गांव में राव राम बख्श सिंह के किले में हजार टन सोना दबा पड़ा है. और राजा ने साधु को उसकी हिफाजत करने को कहा. साधु ने ये सपना यूपीए सरकार के मंत्री को क्या बताया. एक उपेक्षित किला और उपेक्षित गांव सुर्खियों में आ गया है.
महाखजाने की खोज शुरू हो गई है. लेकिन ये सवाल अभी तक अटका है कि यह खजाना आखिर किसका है. कोई कहता है कि ये खजाना राजा राव राम बख्श सिंह का है तो कोई इसे पेशवा बाजीराव का खजाना बता रहा है.
साढ़े 6 सौ साल पुरानी रियासत डौंडिया खेड़ा के जमींदार विशेश्वर सिंह के बेटे प्रोफेसर लाल अमरेन्द्र सिंह के मुताबिक ये खजाना राम बख्श के पूर्वज महाराज त्रिलोकचंद का है. प्रोफेसर लाल अमरेंद्र सिंह की मानें तो ये खजाना 16वीं शताब्दी में यहां राज करने वाले महाराज त्रिलोकचंद ने जुटाया था.
महाखजाने को किले की दीवारों में भी छिपाया गया हो सकता है. ये दावा है प्रोफेसर लाल अमरेंद्र सिंह का. इस खजाने का एक नक्शा भी है, जिसे राजा राम बक्श नें अपनी मां के पास छोड़ दिया था. इस दावे के पीछे कई वजहें हैं.
महाराजा त्रिलोक चंद यहां के सबसे प्रतापी राजा हुए, जिन्हें इलाके में वैश्यों का सबसे प्रतापी राजा कहा जाता था. त्रिलोक चंद दिल्ली के बादशाह लोदी से जुड़े हुये थे. इनके अलावा मैनपुरी के राजा सुमेर शाह चौहान भी बहलोल लोदी से जुडे हुये थे. त्रिलोकचंद का राज उन्नाव के अलावा बहराइच, कन्नौज, बाराबंकी और लखीमपुर खीरी तक फैला हुआ था. इसीलिए माना जा रहा है कि इतना बड़ा खजाना महाराजा त्रिलोकचंद का हो सकता है.
डौंडियाखेड़ा गांव के किले के पास जो मंदिर है, वो राजा रावराम बख्श सिंह ने बनवाया था, जबकि मंदिर के शिखर की स्थापना और मूर्ति स्थापना 1932 में जमींदार विशेश्वर सिंह ने कराई थी.
